हमारे सरकारी आदर्श - विवेकानन्द
हमारे देश की जनता में पिछले दिनों जो जागरूकता दिखाई दी वो बड़ी सराहनीय है, चाहे वो चुनाव में हो या विभिन्न आंदोलनों में। नेहरू, गांधी, राष्ट्रगान आदि से सम्बन्धित गलत परम्पराएं व मान्यतायें किन्ही कारणो से भले ही आज भी प्रचलित हों, पर उनकी सच्चाई जानने के बाद समाज मे उनका विरोध अवश्य पैदा हुआ है। पर एक ऐसी अंधपरम्परा जिसका विरोध करने मे आज के बड़े-बड़े समाज सुधारक भी डरते हैं, और तो और समाज सुधार का सबसे बड़ा झंडा हाथ में रखने वाले आर्य भी इस महान पाखंड को अपने मंचो पर स्थान देकर इस अंधपरम्परा से समझौता करते देखे गये हैं। इस अंधपरम्परा का नाम है-- "महापुरूष विवेकानन्द".
जो इस नाम के जीवन से परिचित हैं वो भी मौन साधे हुए हैं (कुछ को छोड़कर)। दरसल स्वामी विवेकानन्द को RSS ने गोद लिया हुआ है, इस नाते वो सरकार के भी रिश्तेदार हैं, क्योंकि सरकार RSS से प्रेरित है। दरसल विवेकानन्द के पूरे जीवन में एक भी गुण ऐसा नहीं है जिससे वो हिन्दुओं के आदर्श बन सकें। हाँ , इस्लाम में उन्हे एक अच्छा खासा पद मिल सकता है, क्योंकि गाय का मांस और सौन्दर्य के प्रति आसक्ति उनके जीवन में भरी पड़ी है.. ।
असल में बात ये है कि RSS को किसी ऐसे अच्छे आदमी की तलाश थी, जिसका फोटो लगाकर राजनीति की जा सके। जो धर्मगुरु उपलब्ध थे, अलग- अलग मान्यता वाले थे। अब राजनीति के लिये तो ऐसा आदमी चाहिये, जिसकी कोई बुराई ना करता हो (चाहे भलाई भी ना करता हो)। दयानन्द को इसलिये नहीं अपना सकते थे । क्योंकि सत्य के लिये तो दयानन्द अपने पिता तक से आमने सामने हो गये थे। ऐसे में विवेकानन्द को पकड़कर आदर्श घोषित कर दिया गया. और उसे हमारे सामने किस तरह परोसा गया, उसका एक उदाहरण देखिये-- श्याम जी , कृष्ण वर्मा के पैत्रक गांव माण्डवी (गुजरात) के पास एक भव्य संग्रहालय बनाया गया है, जिसमे श्याम जी कृष्ण वर्मा की अस्थियां व जीवन से सम्बन्धित चित्रावली है। महर्षि दयानन्द उनके गुरु थे इसलिये एक दयानन्द दीर्घा भी अलग से बनाई गई है। पर उस संग्रहालय में श्याम जी कृष्ण वर्मा का जो सबसे बड़ा चित्र है, उसके साथ दयानन्द का नहीं बल्कि विवेकानन्द का चित्र लगा है। क्यों जी, ये क्या जबरदस्ती है। विवेकानन्द संघ के गुरू हैं, इससे कोई आपत्ति नही है। विश्व का सबसे बड़ा सगठन है, वो चाहें तो किसी भी अघोरी को पकड़कर धर्मगुरु बना दें। इससे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। पर जिस क्रान्तिकारी के साथ विवेकानन्द का दूर- दूर तक कोई रिश्ता नहीं है, उससे सम्बन्धित संग्रहालय में विवेकानन्द का क्या काम. उनके गुरु तो दयानन्द थे ना। श्याम जी कृष्ण वर्मा ही नहीं बलकी किसी भी क्रान्तिकारी से उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई सम्बन्ध नही था। पर क्योंकि विवेकानन्द सरकारी आदर्श हैं, इसलिये जहाँ सरकार वहां विवेकानन्द।
अंग्रेज़ो ने भारत में शासन करने के लिए यही के कुछ प्रभावशाली चुनिंदा लोगो को अपना एजेंट बनाया। जिनके माध्यम से अंग्रेज़ो ने हिन्दुओ के ह्रदय में पनप रही बदले की आग को ठंडा बनाये रखा । विवेकानंद का नाम आते ही एक राष्ट्र भक्त हिन्दू महात्मा की छवि उभरती है | परन्तु मित्रों, इससे पहले कुछ प्रमाणों पर नजर डालते है | क्योंकि बिना सच जाने और माने, कभी हम धर्म की रक्षा नहीं कर पाएंगे | स्वामी विवेकानंद ने हिन्दुओं को उन्हीं के धार्मिक ग्रंथो से झुठे तथ्य दिखाकर मांसाहार सिखाया। यहाँ तक की अंग्रेजों के शासन को हिन्दुओं के लिए फायदेमंद बताया। ये मतलबपरस्त इन्सान मुल्लों की सभाओं में इस्लाम की बड़ाई और अंग्रेजो की सभाओं में ईसाइयत की बड़ाई करता था। अमेरिका प्रवास के दौरान यह गौमांस का भी सेवन करता था।। आँखें खोलो "कम्पलीट वर्क और विवेकानंद" नामक पुस्तक में विवेकानंद जी के संसार भर में दिए गए व्याख्यानों और लिखे गए पत्रो को उन्ही के स्थापित किया संघठन ने छापा है | अब सवाल उनसे जो तुष्टीकरण का विरोध करते हैं-- क्यों साहब ! वोट ना मिलने के डर से मुसलमानो की गलत बात का भी समर्थन करना, ये मुस्लिम तुष्टीकरण है। तो क्या कुछ हिन्दुओं के वोट के लिये या उनकी नाराज़गी के डर से विवेकानंद की गलत बातों को भी मानना, ये तुष्टिकरण नहीं है। जो विवेकानन्द को आदर्श मानते हैं। वे एक बार उसका जीवन चरित्र जरूर पढ़ें। पूरे जीवन में से अच्छाईयां इकट्ठी करें ओर बतायें कि दयानन्द के सामने विवेकानन्द की क्या स्थिती है। ये ज़रूरी नही कि सब लोग शराब पीना छोड़ दें, पर सभ्य समाज मे शराब पीने को निन्दित समझा जाये, ये बहुत ज़रूरी है। सब लोग महापुरुष नहीं बन सकते, पर जिसको वे महापुरुष मानें, वो वास्तव में महापुरुष ही होना चाहिये, ताकि जो भी महान बनना चाहे, वो उस महापुरुष के जीवन से सही दिशा ले सके। अन्यथा विवेकानन्द का अनुसरण करके तो शराबी, कबाबी और अय्याश ही बना जा सकता है। जो लोग विवेकानन्द को आदर्श मानते है, वे विवेकानन्द में राम और कृष्ण को ढूंढने की कोशिश करें , असफलता ही हाथ लगेगी। और अगर फिर भी उसे आदर्श मानना है तो - गौ माता की जय बोलनी छोड़कर, गोमांस खाईये, - योग दर्शन व अन्य शास्त्रों से अहिंसा, अपरिग्रह आदि शब्दों को हटा दीजिये। ज्यादातर हिन्दुओ के लिए विवेकानंद बहुत बड़े आदर्श है | उन्होंने उन्नीसवी सदी (1893) में शिकागो में विश्व धर्मं सम्मेल्लन में हिन्दू धर्मं का प्रतिनिधित्व किया | पर उनके निजी विचार जान कर, उनके रहन-सहन खान पान को जान कर, कही भी नहीं लगता, ये कोई संत या एक सामान्य हिन्दू भी हैं | बल्कि इनके अनुयायी रामकृष्ण मिशन वालों ने तो स्वंम को हिन्दू ना कहेलाए जाने के लिए कोर्ट में आवेदन भी किया था| पर आश्चर्य तो इस बात का है की कुछ मुर्ख हिन्दू उन्हें फिर भी सर आँखों पर चढ़ा कर रखते है, बिना जाने के किस कारण से वो इसके अधिकारी है | मै रामकृष्ण जी, जो की विवेकानंद के गुरु थे और विवेकानंद के बारे में रामकृष्ण की ही पुस्तकों से प्रमाण दे कर उनके विचारों को आपके सामने रखने जा रहा हूँ | बहुत से लोग जो भावनात्मक रूप से जुड़े है उनको दुःख होगा, पर मेरा निवेदन है कि बजाय मुझे बुरा भला कहेने के उन किताबो के पन्ने पलटिये जिनके मै प्रमाण दे रहा हूँ | रामकृष्ण या विवेकानंद का साहित्य मैंने स्वयं तो नहीं लिखा, मै तो सिर्फ उनही के विचार आप तक पंहुचा रहा हूँ | आइये जानते है विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण के विचारो के बारे में ........................
1: काली जी पर बलि देना तो सबको पता है, पर देखिये स्वयं विवेकानंद इस बलि के नाम पर होने वाली हत्यायो का कितना समर्थन करते थे |
"One day in the Kali temple of Calcutta, a western lady shuddered at the sight of blood of Goats, sacrificed before the mighty, and exclaimed - 'why is there so much blood before the Godess?' Quickly the Swami (Vivekanand) replied - why not a little blood to complete the picture?" -Vivekanand A Biography by Swami Nikhilanand, P.261
बड़े बड़े समाजसुधारकों ने देवी देवताओं को बलि से दूर रखा है, भले ही वे स्वयं मांस भक्षण करते हों, पर विवेकानंद अपवाद थे | स्वामी विवेकानंद द्वारा पशु बलि Sister Christine को बेलुर मठ हावड़ा से 12th November 1901 को लिखे अपने पत्र में लिखते हैं कि हमने काली मां की पूजा की और बकरे की बलि दी। स्वामी जी अपनी अज्ञानता के कारण जहाँ वैदिक धर्म पर बली का आरोप जड़ते हैं। वहीं खुद वो ही निंदनीय कर्म करने मे संलग्न होते हैं। We had an image, too, and sacrificed a goat and burned a lot of fireworks. The complete work of Swami Vivekanand, Vol – 9- Pg 169
"One day in the Kali temple of Calcutta, a western lady shuddered at the sight of blood of Goats, sacrificed before the mighty, and exclaimed - 'why is there so much blood before the Godess?' Quickly the Swami (Vivekanand) replied - why not a little blood to complete the picture?" -Vivekanand A Biography by Swami Nikhilanand, P.261
बड़े बड़े समाजसुधारकों ने देवी देवताओं को बलि से दूर रखा है, भले ही वे स्वयं मांस भक्षण करते हों, पर विवेकानंद अपवाद थे | स्वामी विवेकानंद द्वारा पशु बलि Sister Christine को बेलुर मठ हावड़ा से 12th November 1901 को लिखे अपने पत्र में लिखते हैं कि हमने काली मां की पूजा की और बकरे की बलि दी। स्वामी जी अपनी अज्ञानता के कारण जहाँ वैदिक धर्म पर बली का आरोप जड़ते हैं। वहीं खुद वो ही निंदनीय कर्म करने मे संलग्न होते हैं। We had an image, too, and sacrificed a goat and burned a lot of fireworks. The complete work of Swami Vivekanand, Vol – 9- Pg 169
2: विवेकानंद का खान पान
(i) Mrs Ole Bull को Alambazar Math Calcutta (Darjelling ) से 26 th March 1897 को लिखे अपने पत्र में अपनी बीमारी से ग्रस्त होने को बयां करते हुए स्वामी विवेकानंद लिखते हैं की केवल मांस खाना ही लम्बी आयु का राज है Admitting about the diabetes problem he said that Eating only meat and drinking no water seems to be the only way to prolong life -The complete work of Swami Vivekanand, Vol – 9- Pg 93 (ii) मैरी नामक महिला को 28th April 1897 को अपने स्वास्थय के बारे में लिखते हुए स्वामी विवेकानंद लिखते हें की मेरे बाल भूरे हो गए हें चहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी हैं और में अपनी उम्र से 20 वर्ष ज्यादा का दिखने लगा हूँ। मेरा शरीर कमजोर हो रहा है। में मांस खाने के लिए ही बना हूँ ना रोटी ना आलू ना राइस ना ही शक्कर| My hair is turning grey in bundles, and my face is getting wrinkled up all over; that losing of flesh has given me twenty years of age more. And now I am losing flesh rapidly, because I am made to live upon meat and meat alone — no bread, no rice, no potatoes, not even a lump of sugar in my coffee!! I -The complete work of Swami Vivekanand, Vol – 6- Pg 391 (iii) गोमांस खाने का विरोध करने पर हिन्दुओ को कैसा बेहूदा तर्क देते है स्वामी विवेकानंद जरा देखिये
"To the accusation from some Hindus that the Swami was eating forbidden food, he retorted- if the people of India want me to keep strictly to Hindu diet, please tell them to send me a cook and money enough to keep him"
Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 129
अरे लानत है, उन हिन्दुओ पर जो अब भी ऐसे व्यक्ति को आदर्श माने| ये अमेरिकियो के रंग में रंगे नहीं तो और क्या है| हिंदुओं का प्रतिबंधित भोजन गोमांस ही होता है इस में किसी को शक नहीं होना चाहिए |
(iv) आज के कम्यूनिस्ट इतिहासकार ब्राहमणों को गोमांस खाने वाला लिखते है, कही वो विवेकानंद से ही तो प्रेरित नहीं |
"Orthodox Brahmans regarded with abhorrance the habit of animal food. The swami told them the habit of beef eating by Brahamans in Vedic times".Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 260
दुःख की बात ये है के वही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वाले विवेकानंद को आदर्श बताते है और कम्यूनिस्टो का हिन्दू विरोधी बता के विरोध करते है जबकि कम्यूनिस्टो का प्रेरणा श्रोत तो यही दिख रहे है| इसका अनुमान तो आप स्वयं ही लगा सकते है कि ऐसे स्वामी ने शास्त्रों का कितना अध्ययन किया होगा|
(v) "He advocated animal food for the Hindus, if they were to cope at all with the rest of the world and find a place among the great nation".Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 96
वाह जी वाह, दुनिया का मुकाबला करना है तो मांस खाने लग जाये| हमारे चक्रवर्ती राजाओ ने दसियों बार विश्व विजय शाकाहारी सेनाओ के साथ की और इनका जन्म हुआ है हमें मांसाहार सिखाने के लिए | आज भी शक्ति के मापक के तौर पर शाकाहारी घोड़े की शक्ति को ही प्रधानता दी जाती है और " Horse Power" कहा जाता है ना की "Lion Power" .
(vi) एक भक्त ने स्वामीजी से पूछा - "मांस तथा मछली खाना क्या उचित और आवश्यक है?" स्वामी जी ने उतर दिया "खूब खाओ भाई, इससे जो पाप होगा, वहा मेरा होगा .....वैदिक तथा मनु के धर्मं में मछली और मांस खाने का विधान है |..... घास-पात खाकर पेट -रोग से पीड़ित बाबा जी के दल से देश भर गया है.... अतः अब देश के लोगो को मछली , मांस खिला कर उधमशील बनाना होगा |" - विवेकानंद के संग में, 267-70
इतने घटिया विचार तो एक ऐसा व्यक्ति रख सकता है, जिसने वेद पढ़े ही न हों और यदि पढ़े तो समझ न सका हो| पुनः “अगर भारत के लोग चाहते है की में हिन्दू धर्म के अनुसार भोजन करू तो उनसे कहो की मेरे लिए पर्याप्त धनराशि और रसोइया भेज दे | If the people in India want me to keep strictly to my Hindu diet, please tell them to send me a cook and money enough to keep him.” -The complete work of Swami Vivekanand Vol 5, Page 95 (vii) “चाहे कोई कुछ भी कहे परन्तु सच ये ही है की जो देश भोजन के रूप में हमेशा मांस का सेवन नियमबद्ध करते है वे निसंदेह वीर, पराक्रमी और विचारवान है | Whatever one or the other may say, the real fact, however, is that the nations who take the animal food are always, as a rule, notably brave, heroic and thoughtful.”--The complete work of Swamee Vivekanand, Vol – 6- Pg 484.
(i) Mrs Ole Bull को Alambazar Math Calcutta (Darjelling ) से 26 th March 1897 को लिखे अपने पत्र में अपनी बीमारी से ग्रस्त होने को बयां करते हुए स्वामी विवेकानंद लिखते हैं की केवल मांस खाना ही लम्बी आयु का राज है Admitting about the diabetes problem he said that Eating only meat and drinking no water seems to be the only way to prolong life -The complete work of Swami Vivekanand, Vol – 9- Pg 93 (ii) मैरी नामक महिला को 28th April 1897 को अपने स्वास्थय के बारे में लिखते हुए स्वामी विवेकानंद लिखते हें की मेरे बाल भूरे हो गए हें चहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी हैं और में अपनी उम्र से 20 वर्ष ज्यादा का दिखने लगा हूँ। मेरा शरीर कमजोर हो रहा है। में मांस खाने के लिए ही बना हूँ ना रोटी ना आलू ना राइस ना ही शक्कर| My hair is turning grey in bundles, and my face is getting wrinkled up all over; that losing of flesh has given me twenty years of age more. And now I am losing flesh rapidly, because I am made to live upon meat and meat alone — no bread, no rice, no potatoes, not even a lump of sugar in my coffee!! I -The complete work of Swami Vivekanand, Vol – 6- Pg 391 (iii) गोमांस खाने का विरोध करने पर हिन्दुओ को कैसा बेहूदा तर्क देते है स्वामी विवेकानंद जरा देखिये
"To the accusation from some Hindus that the Swami was eating forbidden food, he retorted- if the people of India want me to keep strictly to Hindu diet, please tell them to send me a cook and money enough to keep him"
Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 129
अरे लानत है, उन हिन्दुओ पर जो अब भी ऐसे व्यक्ति को आदर्श माने| ये अमेरिकियो के रंग में रंगे नहीं तो और क्या है| हिंदुओं का प्रतिबंधित भोजन गोमांस ही होता है इस में किसी को शक नहीं होना चाहिए |
(iv) आज के कम्यूनिस्ट इतिहासकार ब्राहमणों को गोमांस खाने वाला लिखते है, कही वो विवेकानंद से ही तो प्रेरित नहीं |
"Orthodox Brahmans regarded with abhorrance the habit of animal food. The swami told them the habit of beef eating by Brahamans in Vedic times".Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 260
दुःख की बात ये है के वही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वाले विवेकानंद को आदर्श बताते है और कम्यूनिस्टो का हिन्दू विरोधी बता के विरोध करते है जबकि कम्यूनिस्टो का प्रेरणा श्रोत तो यही दिख रहे है| इसका अनुमान तो आप स्वयं ही लगा सकते है कि ऐसे स्वामी ने शास्त्रों का कितना अध्ययन किया होगा|
(v) "He advocated animal food for the Hindus, if they were to cope at all with the rest of the world and find a place among the great nation".Vivekanand - A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 96
वाह जी वाह, दुनिया का मुकाबला करना है तो मांस खाने लग जाये| हमारे चक्रवर्ती राजाओ ने दसियों बार विश्व विजय शाकाहारी सेनाओ के साथ की और इनका जन्म हुआ है हमें मांसाहार सिखाने के लिए | आज भी शक्ति के मापक के तौर पर शाकाहारी घोड़े की शक्ति को ही प्रधानता दी जाती है और " Horse Power" कहा जाता है ना की "Lion Power" .
(vi) एक भक्त ने स्वामीजी से पूछा - "मांस तथा मछली खाना क्या उचित और आवश्यक है?" स्वामी जी ने उतर दिया "खूब खाओ भाई, इससे जो पाप होगा, वहा मेरा होगा .....वैदिक तथा मनु के धर्मं में मछली और मांस खाने का विधान है |..... घास-पात खाकर पेट -रोग से पीड़ित बाबा जी के दल से देश भर गया है.... अतः अब देश के लोगो को मछली , मांस खिला कर उधमशील बनाना होगा |" - विवेकानंद के संग में, 267-70
इतने घटिया विचार तो एक ऐसा व्यक्ति रख सकता है, जिसने वेद पढ़े ही न हों और यदि पढ़े तो समझ न सका हो| पुनः “अगर भारत के लोग चाहते है की में हिन्दू धर्म के अनुसार भोजन करू तो उनसे कहो की मेरे लिए पर्याप्त धनराशि और रसोइया भेज दे | If the people in India want me to keep strictly to my Hindu diet, please tell them to send me a cook and money enough to keep him.” -The complete work of Swami Vivekanand Vol 5, Page 95 (vii) “चाहे कोई कुछ भी कहे परन्तु सच ये ही है की जो देश भोजन के रूप में हमेशा मांस का सेवन नियमबद्ध करते है वे निसंदेह वीर, पराक्रमी और विचारवान है | Whatever one or the other may say, the real fact, however, is that the nations who take the animal food are always, as a rule, notably brave, heroic and thoughtful.”--The complete work of Swamee Vivekanand, Vol – 6- Pg 484.
3: विवेकानंद के इस्लाम पर विचार
इनका फिर वही दोहरा रवैया | दो मुहीं बातें देखिये|
"The vast majority of perverts to Islam and Christanity are perverts by the swords or descendents of those." - Teachings of Swami Vivekanand Pg 13
"The Mohammadon religion allows Mohammdons to kill all those who are not of their religion. It is clearly stated in Koran- 'Kill the infidels if they do not accept Islam. They must be put to fire and sword" -Teachings of Swami Vivekanand Pg 180
"The Mohammadon came upon the people of India always killing and slaughtering. By slaughtering and killing they over ran them". Teachings of Swami Vivekanand Pg 151
देखिये उनकी विरोधाभासी बाते
"It is the followers of Islam and Islam alone who look upon and behave towards all mankind as their own soul"-
A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 254
"Without the help of Islam and the theories of Vedant however fine and wonderful they may be, are entirely valueless."
-A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 255
The spirit of democracy and equality in Islam appealed to Narendra's (Vivekanand's) mind and he wanted to create a new India with Vedantic brain and Islamic body." --A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 79
स्वामी विवेकानन्द इस्लाम के बड़े प्रशंसक और इसके भाईचारा के सिद्धांत से अभिभूत थे। वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर को वह भारत की मुक्ति का मार्ग मानते थे। अल्मोड़ा से दिनांक 10 जून 1898 को अपने एक मित्र नैनीताल के मुहम्मद सरफ़राज़ हुसैन को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा कि ‘‘अपने अनुभव से हमने यह जाना है कि व्यावहारिक दैनिक जीवन के स्तर पर यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने समानता के सिद्धांत को प्रशंसनीय मात्र में अपनाया है तो वह केवल इस्लाम है। इस्लाम समस्त मनुष्य जाति को एक समान देखता और बर्ताव करता है। यही अद्वैत है। इसलिए हमारा यह विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, अद्वैत का सिद्धांत चाहे वह कितना ही उत्तम और चमत्कारी हो, विशाल मानव-समाज के लिए बिल्कुल अर्थहीन है।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 5, पेज 415
स्वामी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘‘भारत में इस्लाम की ओर धर्म परिवर्तन तलवार (बल प्रयोग) या धोखाधड़ी या भौतिक साधन देकर नहीं हुआ था।’’ विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 8, पेज 330
Then he writes
"मुस्लमान सार्वजानिक भ्रात्भाव का शोर मचाते है, किन्तु वास्तविक भ्रात्भाव से कितने दूर हैं | जो मुस्लमान नहीं है वो उनके भ्रात्त्संघ में शामिल नहीं हो सकते है | उनके गले कटे जाने की ही अधिक सम्भावना है | -धर्मरहस्य, प्रष्ट 43
"For our own motherland a junction of two great religious systems- Hinduism and Islam - is the only hope."
A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 218
also on -Teachings of Swami Vivekanand Pg 255
विवेकानंदा का हिन्दू धर्मं से अरुचि और रामकृष्ण का इस्लाम पंथ से प्रभावित होके मुस्लिम होने को हां करना |
कह सकते है की इसी कारण स्वामी विवेकानंद इस्लाम का गीत गाते रहे है उसका प्रमाण हम आगे देंगे|
इनका फिर वही दोहरा रवैया | दो मुहीं बातें देखिये|
"The vast majority of perverts to Islam and Christanity are perverts by the swords or descendents of those." - Teachings of Swami Vivekanand Pg 13
"The Mohammadon religion allows Mohammdons to kill all those who are not of their religion. It is clearly stated in Koran- 'Kill the infidels if they do not accept Islam. They must be put to fire and sword" -Teachings of Swami Vivekanand Pg 180
"The Mohammadon came upon the people of India always killing and slaughtering. By slaughtering and killing they over ran them". Teachings of Swami Vivekanand Pg 151
देखिये उनकी विरोधाभासी बाते
"It is the followers of Islam and Islam alone who look upon and behave towards all mankind as their own soul"-
A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 254
"Without the help of Islam and the theories of Vedant however fine and wonderful they may be, are entirely valueless."
-A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 255
The spirit of democracy and equality in Islam appealed to Narendra's (Vivekanand's) mind and he wanted to create a new India with Vedantic brain and Islamic body." --A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 79
स्वामी विवेकानन्द इस्लाम के बड़े प्रशंसक और इसके भाईचारा के सिद्धांत से अभिभूत थे। वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर को वह भारत की मुक्ति का मार्ग मानते थे। अल्मोड़ा से दिनांक 10 जून 1898 को अपने एक मित्र नैनीताल के मुहम्मद सरफ़राज़ हुसैन को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा कि ‘‘अपने अनुभव से हमने यह जाना है कि व्यावहारिक दैनिक जीवन के स्तर पर यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने समानता के सिद्धांत को प्रशंसनीय मात्र में अपनाया है तो वह केवल इस्लाम है। इस्लाम समस्त मनुष्य जाति को एक समान देखता और बर्ताव करता है। यही अद्वैत है। इसलिए हमारा यह विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, अद्वैत का सिद्धांत चाहे वह कितना ही उत्तम और चमत्कारी हो, विशाल मानव-समाज के लिए बिल्कुल अर्थहीन है।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 5, पेज 415
स्वामी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘‘भारत में इस्लाम की ओर धर्म परिवर्तन तलवार (बल प्रयोग) या धोखाधड़ी या भौतिक साधन देकर नहीं हुआ था।’’ विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 8, पेज 330
Then he writes
"मुस्लमान सार्वजानिक भ्रात्भाव का शोर मचाते है, किन्तु वास्तविक भ्रात्भाव से कितने दूर हैं | जो मुस्लमान नहीं है वो उनके भ्रात्त्संघ में शामिल नहीं हो सकते है | उनके गले कटे जाने की ही अधिक सम्भावना है | -धर्मरहस्य, प्रष्ट 43
"For our own motherland a junction of two great religious systems- Hinduism and Islam - is the only hope."
A biography by Swami Nikhilanand Saraswati Pg 218
also on -Teachings of Swami Vivekanand Pg 255
विवेकानंदा का हिन्दू धर्मं से अरुचि और रामकृष्ण का इस्लाम पंथ से प्रभावित होके मुस्लिम होने को हां करना |
कह सकते है की इसी कारण स्वामी विवेकानंद इस्लाम का गीत गाते रहे है उसका प्रमाण हम आगे देंगे|
4: रामकृष्ण मिशन का हिन्दू ना होने के पक्ष में तर्क देना
रामकृष्ण मिशन ने अपने हिन्दू न होने के पक्ष में कलकत्ता उच्च न्यायालय में जो तर्क दिए थे उनका अंश अहमदाबाद से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र "टाइमस ऑफ़ इंडिया" के २३ जनवरी १८८६ के अंक से यहाँ उध्रत किया जा रहा है -
"During his practice of Islam he repeated the name of Allah and said Namaz thrice daily. During this while he dressed and ate like Muslim. Another biographical work 'Ramkrishna Panth' by Akshoy Sen, provides some more details. A muslim cook was brought who instructed the Brahman cook how to wear lungi and cook like muslim way. We are also told that at this time, Ramkrishna felt a great urge to take beef. However, this urge could not be satisfied openly. But one day as he sat on the bank of Ganges, a carcase of cow was floating by. He entered the body of a dog astrally and tasted the flesh of the cow. His muslim sadhana was not completed.
All this is highly comic but it holds an important position in the mission. The lawyers in the mission did not forget to argue in the court that Ramkrishna was on the verge of eating beef. This was meant to prove that he was indifferent hindu and not far from being a devout muslim." The mission won the case.
ऐसे गुरु को विवेकानंद ईश्वर का अवतार मानते थे यानि अवतार जो मुस्लिम हो जाए | आइये आगे पड़ते है-
"Though Thousands of Years the lives of the great prophets of yore came down to us, and yet, none stands so high in brilliance as the the life of Ramkrishna Paramhansa." II, ३१२
स्वामी विवेकानंद की फ्रेंच भाषा में प्रकाशित जीवनी के लेखक रोम्य रोल्ला के अनुसार रामकृष्ण एक मुस्लमान से प्रभावित होकर अपना धर्मंपरिवर्तन करने और गोमांस खाने के लिए तैयार हो गए थे | इस प्रसंग में मैक्समुलर ने लिखा है - "For long days he (Ramkrishna) subjected himself to various kinds of discipline to realise the Mohammadon idea of all powerful Allah. He let his beard grow, he fed himself on Muslim diet, he completely repeated the Quran." A Real Mahatman P.३५
मेरे अनुभव से अगर संसार में कोई धर्म समानता, सोहाद्र और प्रेम की प्रसंशनीय प्राप्ति कर सकता है तो वह सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है| हमारी अपनी मातृभूमि के लिए एक ही उम्मीद है दो महान प्रणाली, हिंदू धर्म और इस्लाम का मिला जुला एक स्वरुप - वेदांत मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर| Whether we call it Vedantism or any ism, the truth is that Advaitism is the last word of religion and thought and the only position from which one can look upon all religions and sects with love. On the other hand, my experience is that if ever any religion approached to this equality in an appreciable manner, it is Islam and Islam alone. For our own motherland a junction of the two great systems, Hinduism and Islam — Vedanta brain and Islam body — is the only hope.-The complete work of Swamee Vivekanand, Vol –6
रामकृष्ण मिशन ने अपने हिन्दू न होने के पक्ष में कलकत्ता उच्च न्यायालय में जो तर्क दिए थे उनका अंश अहमदाबाद से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र "टाइमस ऑफ़ इंडिया" के २३ जनवरी १८८६ के अंक से यहाँ उध्रत किया जा रहा है -
"During his practice of Islam he repeated the name of Allah and said Namaz thrice daily. During this while he dressed and ate like Muslim. Another biographical work 'Ramkrishna Panth' by Akshoy Sen, provides some more details. A muslim cook was brought who instructed the Brahman cook how to wear lungi and cook like muslim way. We are also told that at this time, Ramkrishna felt a great urge to take beef. However, this urge could not be satisfied openly. But one day as he sat on the bank of Ganges, a carcase of cow was floating by. He entered the body of a dog astrally and tasted the flesh of the cow. His muslim sadhana was not completed.
All this is highly comic but it holds an important position in the mission. The lawyers in the mission did not forget to argue in the court that Ramkrishna was on the verge of eating beef. This was meant to prove that he was indifferent hindu and not far from being a devout muslim." The mission won the case.
ऐसे गुरु को विवेकानंद ईश्वर का अवतार मानते थे यानि अवतार जो मुस्लिम हो जाए | आइये आगे पड़ते है-
"Though Thousands of Years the lives of the great prophets of yore came down to us, and yet, none stands so high in brilliance as the the life of Ramkrishna Paramhansa." II, ३१२
स्वामी विवेकानंद की फ्रेंच भाषा में प्रकाशित जीवनी के लेखक रोम्य रोल्ला के अनुसार रामकृष्ण एक मुस्लमान से प्रभावित होकर अपना धर्मंपरिवर्तन करने और गोमांस खाने के लिए तैयार हो गए थे | इस प्रसंग में मैक्समुलर ने लिखा है - "For long days he (Ramkrishna) subjected himself to various kinds of discipline to realise the Mohammadon idea of all powerful Allah. He let his beard grow, he fed himself on Muslim diet, he completely repeated the Quran." A Real Mahatman P.३५
मेरे अनुभव से अगर संसार में कोई धर्म समानता, सोहाद्र और प्रेम की प्रसंशनीय प्राप्ति कर सकता है तो वह सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है| हमारी अपनी मातृभूमि के लिए एक ही उम्मीद है दो महान प्रणाली, हिंदू धर्म और इस्लाम का मिला जुला एक स्वरुप - वेदांत मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर| Whether we call it Vedantism or any ism, the truth is that Advaitism is the last word of religion and thought and the only position from which one can look upon all religions and sects with love. On the other hand, my experience is that if ever any religion approached to this equality in an appreciable manner, it is Islam and Islam alone. For our own motherland a junction of the two great systems, Hinduism and Islam — Vedanta brain and Islam body — is the only hope.-The complete work of Swamee Vivekanand, Vol –6
5: राष्ट्र के स्वतंत्रता आन्दोलन व सामाजिक सुधारो पर उनके विचार
देश के स्वाधीनता संग्राम में उनका कोई योगदान नहीं है देखिये
"The policy of Ramkrishna mission has always been faithful to (its founder) swami Vivekanand's intention. In the early twenties, when India's struggle with England had become intense and bitter, the mission has harshly criticised for refusing to allow its members to take part in the freedom struggle."
- Teachings of Swami Vivekanand, P.38
उनके जीवनीकार उलट ही लिखते है -
"Ramkrishna & Vivekanand were the first awakeners of India's National Consciousness. They were India's first nationalist leaders in the true sense of the term. The Movement for India's liberation started from Dakshineswar."
-Bio. 231
पर इस बात का खंडन इसी पुस्तक में आगे स्वयं विवेकानंद के शब्दों में देखिये
"Let no political significance ever be attached falsely to my writings. What nonsense! " He said as early as September 1894. A year later he wrote: "I do not believe in Politics. God and truth are the only politics in the world. All else is trash." –Bio. 232
अब जब स्वयं स्वामी विवेकानंद ही ये लिख रहे है कि उनका राजनीती में कोई रुझान नहीं, तो वे स्वतंत्रता आन्दोलन के अग्रदूत कैसे हो सकते है ?
देश के स्वाधीनता संग्राम में उनका कोई योगदान नहीं है देखिये
"The policy of Ramkrishna mission has always been faithful to (its founder) swami Vivekanand's intention. In the early twenties, when India's struggle with England had become intense and bitter, the mission has harshly criticised for refusing to allow its members to take part in the freedom struggle."
- Teachings of Swami Vivekanand, P.38
उनके जीवनीकार उलट ही लिखते है -
"Ramkrishna & Vivekanand were the first awakeners of India's National Consciousness. They were India's first nationalist leaders in the true sense of the term. The Movement for India's liberation started from Dakshineswar."
-Bio. 231
पर इस बात का खंडन इसी पुस्तक में आगे स्वयं विवेकानंद के शब्दों में देखिये
"Let no political significance ever be attached falsely to my writings. What nonsense! " He said as early as September 1894. A year later he wrote: "I do not believe in Politics. God and truth are the only politics in the world. All else is trash." –Bio. 232
अब जब स्वयं स्वामी विवेकानंद ही ये लिख रहे है कि उनका राजनीती में कोई रुझान नहीं, तो वे स्वतंत्रता आन्दोलन के अग्रदूत कैसे हो सकते है ?
6. रामकृष्ण ने स्वयं को राम और कृष्ण का अवतार घोषित किया
"Two days before the death of Ramkrishna, Narendra (Vivekanand) was studying by the bedside of the master when a strange thought flashed into his mind. Was the master (R.K) truly an incarnation of God? He said to himself that he would accept shri R.K.'s divinity if the Master declared himself to be an incarnation. He stood looking intendedly at the master's face. Slowly Shri R.K.'s lips parted and he said in a clear voice - "O my Narendra! Ae you still not convinced? He who in the past was born as Ram and Krishna is now in his body as R.K.". Thus R.K. put himself into the category of Ram and Krishna who are recognised by the Hindus as Avtars or incarnations of God." -Complete works of Swami Vivekananda (Vol. I, P.66-67)
पौराणिक मान्यता को माने तो भी दसवें अवतार कल्कि है तो अब या तो राम कृष्ण को ही कल्कि मानते होंगे| ये बात कही से हजम नहीं होती| "भगवन रामकृष्ण ईश्वर का अवतार थे इसमें मुझे तनिक भी संदेहे नहीं है | भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ ही था, यह हम निश्चित रूप से नहीं कहे सकते और बुद्ध चैतन्य - जैसे अवतार पुराने है, पर रामकृष्ण सबकी अपेक्षा आधुनिक और पूर्ण है |" (पत्रावली २, ५६)
ये तो कम्यूनिस्ट वाली बात हुई| कृष्ण को ही नकार दिया | जैसे एक सामान बेचने वाला अपने माल को अच्छा और दुसरो के माल को घटिया कहता है| वैसे ही कुछ यह स्वामी विवेकानंद करते दिख रहे है | "उनकी (रामकृष्ण की) पवित्रता प्रेम और ऐश्वर्या का कण मात्र प्रकाश ही राम, कृष्ण, बुद्ध आदि में था | -पत्रावली भाग १ ,१८७
और सुनिए पर हसियेगा मत
"सत्ययुग का आरंभ रामकृष्ण के अवतार की जन्मतिथि से हुआ |" -पत्रावली भाग १,१८८
"Two days before the death of Ramkrishna, Narendra (Vivekanand) was studying by the bedside of the master when a strange thought flashed into his mind. Was the master (R.K) truly an incarnation of God? He said to himself that he would accept shri R.K.'s divinity if the Master declared himself to be an incarnation. He stood looking intendedly at the master's face. Slowly Shri R.K.'s lips parted and he said in a clear voice - "O my Narendra! Ae you still not convinced? He who in the past was born as Ram and Krishna is now in his body as R.K.". Thus R.K. put himself into the category of Ram and Krishna who are recognised by the Hindus as Avtars or incarnations of God." -Complete works of Swami Vivekananda (Vol. I, P.66-67)
पौराणिक मान्यता को माने तो भी दसवें अवतार कल्कि है तो अब या तो राम कृष्ण को ही कल्कि मानते होंगे| ये बात कही से हजम नहीं होती| "भगवन रामकृष्ण ईश्वर का अवतार थे इसमें मुझे तनिक भी संदेहे नहीं है | भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ ही था, यह हम निश्चित रूप से नहीं कहे सकते और बुद्ध चैतन्य - जैसे अवतार पुराने है, पर रामकृष्ण सबकी अपेक्षा आधुनिक और पूर्ण है |" (पत्रावली २, ५६)
ये तो कम्यूनिस्ट वाली बात हुई| कृष्ण को ही नकार दिया | जैसे एक सामान बेचने वाला अपने माल को अच्छा और दुसरो के माल को घटिया कहता है| वैसे ही कुछ यह स्वामी विवेकानंद करते दिख रहे है | "उनकी (रामकृष्ण की) पवित्रता प्रेम और ऐश्वर्या का कण मात्र प्रकाश ही राम, कृष्ण, बुद्ध आदि में था | -पत्रावली भाग १ ,१८७
और सुनिए पर हसियेगा मत
"सत्ययुग का आरंभ रामकृष्ण के अवतार की जन्मतिथि से हुआ |" -पत्रावली भाग १,१८८
7. विवेकानंद के मूर्ति पूजा के सम्बन्ध में विचार
"God is eternal, without any form, omnipresent. To think of him as possessing any form, is blasphemy". -VII, 411
अब ये मुझे याद दिलाता है हमारे कट्टरपंथी मुस्लिम भाइयो की, ईश्वर निराकार है ये तो समझ में आता है पर एश्निन्दा इस प्रकार है, ये तो muslim कट्टरपन्थियों वाली बात हुई |
“वैदिकयुग में प्रतिमापुजन का अस्तित्व नहीं था | उस समय लोगों की यह धारणा थी कि ईश्वर सर्वत्र विराजमान है, किन्तु बुद्ध के प्रचार के कारण हम जगत सृष्टा तथा अपने सखा स्वरुप ईश्वर को खो बैठे और उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप मूर्तिपूजा की उत्पत्ति हुयी | लोगो ने बुद्ध की मूर्ति बनाकर उसे पूजना आरंभ किया |” (देववाणी ७५)
"पहले बौध चैत्य, फिर बौध स्तूप और उससे बुद्ध देव का मंदिर बना | इन बौध मंदिरों से हिन्दू मंदिरों की उत्पत्ति हुई | -विवेकानंद से वार्तालाप ११०
"External worship, material worship", say the scriptures, "is the lowest stage to rise high." -I, 16
और सुनिए क्या कहते हैं
"Idolatory is the attempt of undeveloped minds to grasp spiritual truths." -Teachings of Swami Vivekananda, P.142
इतने कड़े शब्दों में तो सिर्फ आचार्य चाणक्य ने ही मूर्तिपूजा की निंदा की है "..... उन्होंने कहा है मुर्ख मूर्ति पूजा करते है " पर जब उन्होंने कहा था, उस वक़्त मूर्ति पूजा की शुरुआत थी | पर विवेकानंद के समय तक तो बहुत हिन्दू थे जो मूर्ति पूजा करते थे, बल्कि हिन्दू धर्मं ने बिना वेदों का अध्ययन किये मूर्ति पूजा को अभिन्न अंग की तरह ले लिया गया था | और स्वामी विवेकानंद के गुरु मूर्ति पूजक थे, उनका क्या करें |
इतना पढने के बाद विवेकानंद के विपरीत विचार देखिये
"यदि मूर्तिपूजा में नाना प्रकार के कुत्सित विचार भी प्रविष्ट हैं, तो भी मैं उसकी निंदा नहीं करूँगा" - (विवेकानंद चरित्र, पृष्ठ १४६)
अरे भाई इतना कहे चुके हैं क्या वह निंदा नहीं | क्या कहें इनको ......
और विरोधाभास देखिये
"When miss noble came to India in January 1898 to work for education of India, he gave her the name of Sister Nivedita. At first he taught her to worship Shiva and then made the whole ceremony eliminate in an offering to the feet of Buddha." -Vivekanand A Biography by Swami Nikhilanand, P.260
अब बताइए कहाँ है इनका विवेक | क्या है इनकी मान्यता कौन समझेगा?
"God is eternal, without any form, omnipresent. To think of him as possessing any form, is blasphemy". -VII, 411
अब ये मुझे याद दिलाता है हमारे कट्टरपंथी मुस्लिम भाइयो की, ईश्वर निराकार है ये तो समझ में आता है पर एश्निन्दा इस प्रकार है, ये तो muslim कट्टरपन्थियों वाली बात हुई |
“वैदिकयुग में प्रतिमापुजन का अस्तित्व नहीं था | उस समय लोगों की यह धारणा थी कि ईश्वर सर्वत्र विराजमान है, किन्तु बुद्ध के प्रचार के कारण हम जगत सृष्टा तथा अपने सखा स्वरुप ईश्वर को खो बैठे और उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप मूर्तिपूजा की उत्पत्ति हुयी | लोगो ने बुद्ध की मूर्ति बनाकर उसे पूजना आरंभ किया |” (देववाणी ७५)
"पहले बौध चैत्य, फिर बौध स्तूप और उससे बुद्ध देव का मंदिर बना | इन बौध मंदिरों से हिन्दू मंदिरों की उत्पत्ति हुई | -विवेकानंद से वार्तालाप ११०
"External worship, material worship", say the scriptures, "is the lowest stage to rise high." -I, 16
और सुनिए क्या कहते हैं
"Idolatory is the attempt of undeveloped minds to grasp spiritual truths." -Teachings of Swami Vivekananda, P.142
इतने कड़े शब्दों में तो सिर्फ आचार्य चाणक्य ने ही मूर्तिपूजा की निंदा की है "..... उन्होंने कहा है मुर्ख मूर्ति पूजा करते है " पर जब उन्होंने कहा था, उस वक़्त मूर्ति पूजा की शुरुआत थी | पर विवेकानंद के समय तक तो बहुत हिन्दू थे जो मूर्ति पूजा करते थे, बल्कि हिन्दू धर्मं ने बिना वेदों का अध्ययन किये मूर्ति पूजा को अभिन्न अंग की तरह ले लिया गया था | और स्वामी विवेकानंद के गुरु मूर्ति पूजक थे, उनका क्या करें |
इतना पढने के बाद विवेकानंद के विपरीत विचार देखिये
"यदि मूर्तिपूजा में नाना प्रकार के कुत्सित विचार भी प्रविष्ट हैं, तो भी मैं उसकी निंदा नहीं करूँगा" - (विवेकानंद चरित्र, पृष्ठ १४६)
अरे भाई इतना कहे चुके हैं क्या वह निंदा नहीं | क्या कहें इनको ......
और विरोधाभास देखिये
"When miss noble came to India in January 1898 to work for education of India, he gave her the name of Sister Nivedita. At first he taught her to worship Shiva and then made the whole ceremony eliminate in an offering to the feet of Buddha." -Vivekanand A Biography by Swami Nikhilanand, P.260
अब बताइए कहाँ है इनका विवेक | क्या है इनकी मान्यता कौन समझेगा?
8. विवेकानंदा और दोहरा चरित्र
अब तक तो स्वयं आप देख चुके होंगे की विवेकानंद का मस्तिष्क या तो अस्थिर था या यह वह जान बुझ कर विरोधाभाषी बात करते थे| कारण साफ है मौके का फायदा उठाना और आप को कोई बुरा न कहेगा| सबकी प्रशंशा करो, सत्य को हांड़ी पे चड़ा दो | स्वयं 'Teachings of Vivekanand' के संपादक पुस्तक की भूमिका में लिखते है -
"Vivekanand was the last person to worry about formal consistency. He almost always spoke extempore, fired by the circumstances of the moment, addressing himself to the condition of a particular group of hearers, reacting to the intent of a certain question. That was his nature- he was supremly indifferent if his words of today seems to contradict those of yesterday".
ऐसे व्यक्ति को अवसरवादी कहते है | सत्यवादी ऐसा व्यक्ति कैसे हो सकता है क्यों की या तो कल की बात सही होगी या आज की | क्या एक संत को सत्य वादी न होना चाहिए ?
है जिसने न वेद का और ना मनुस्मृति का अध्ययन किया हो|
निर्णय आपके हाथ में है विवेकनन्द किस प्रकार हर बार अपनी बात से पलट जाता हैं | हिन्दुओ में ना जाने कितने ढ़ोंगी बाबा हैं| विवेकानंद कोई अपवाद नहीं है| जा कर लेख में दिए गए प्रमाणों को जाचो फिर यहाँ कमेन्ट करो |
क्या आप भी विवेकानंद कि तरह
भगवान राम, कृष्ण को काल्पनिक मानते हैं ?
आप भी माँसाहारी हैं ?
आपके गुरु भी पाँच वक़्त कि नमाज पढ़ने लगे थे क्या ?
क्या आप को युवा अवस्था में बहुत रोगों ने घेर रखा है ?
Vivekananda was an opportunist.
Please verify the following words on RK Mission site as well
http://truthclub.wordpress.com/category/false-gods/vivekananda/
http://www.ramakrishnavivekananda.info/reminiscences/057_ksi.htm
“The Swami also told that he had long taken no fish food, as the South Indian Brahmins whose guest he had been throughout his South Indian tour were forbidden both fish and flesh, and would fain avail himself of this opportunity to have his accustomed fare. I at once expressed my loathing for the taking of fish or flesh as food. The Swami said in reply that the ancient Brahmins of India were accustomed to take meal and even beef and were called upon to kill cows and other animals in yajnas or for giving madhuparka to guests. He also held that the introduction and spread of Buddhism led to the gradual discontinuance of flesh as food, though the Hindu shastras (scriptures) had always expressed a theoretical preference for those who avoided the use of flesh-foods, and that the disfavour into which flesh had fallen was one of the chief causes of the gradual decline of the national strength, and the final overthrow of the national independence of the united ancient Hindu races and states of India. He informed me, at the same time, that in recent years Bengalis had, as a community, begun to use freely animal food of several kinds and that they generally got a Brahmin to sprinkle a little water consecrated by the utterance of a few mantras over a whole flock of sheep and then, without any further qualms of religious conscience, proceeded to hand, draw, and quarter them. The Swami’s opinion, at least as expressed in conversation with me, was that the Hindus must freely take to the use of animal food if India was to at all cope with the rest of the world in the present race for power and predominance among the world’s communities, whether within the British empire, or beyond its limits. I, as a Brahmin of strong orthodox leanings, expressed my entire dissent from his views and held that the Vedic religion had alone taught to man his kinship and unity with nature, that man should not yield to the play of sensuous cravings or the narrow passion for political dominance. The ennobling gospel of universal mercy which had been the unique possession of the Hindus, especially of the Brahmins of South India, should never be abandoned as mistaken, out of date, or uncivilized, and that the world can and ought to make a great ethical advance by adopting a humane diet, and also that no petty considerations of national strength or revival should prevail against the adoption of a policy of justice and humanity cowards our dumb brother-jivas of the brute creation. Knowing, as I fully did, the Swami’s views on this question, I was not surprised to learn that, while in America he had been in the habit of taking animal food, and I think he treated with silent contempt the denunciations and calumnies directed against him on this account.”
सायन, महीधर, उव्वट के भाष्यों से वैदिक धर्मं बदनाम हुआ हैं| आज भी मुसलमान/इसाईं उन्ही का वेद भाष्य प्रयोग कर हिंदू धर्म के बारे में मिथ्या प्रचार करते है कि प्राचीन काल में हिंदू मासाहारी थे, गौमांस भक्षी थे, मूर्तिपूजक थे, जातिवादी थे | रोमिल्ला थापर तथा अन्य साम्यवादी इतिहासकार कोंग्रेस के साथ मिलकर इस मिथ्या प्रचार को छात्र –छात्राओं को पढ़ाने का प्रपंच राष्ट्रीय नीति बना कर करते हैं | ये लोग दयानंद के वैज्ञानिक भाष्य में त्रुटि निकालने का साहस नहीं कर पाते हैं | आर्य समाज ने टूटे हुए हिंदू समाज को एक किया, हर वर्ग से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बनाये | कितने क्रन्तिकारी दिए श्याम जी कृष्ण वर्मा, लाला लाजपत राय, रास बिहारी बोस, राम प्रसाद बिस्मिल, भाई परमानन्द, स्वामी श्रद्धानंद, श्यामा प्रसाद मुख़र्जी | हिंदू धर्मं का रक्षक हैं आर्य समाज | अब बात करे राम कृष्ण और विवेकानंदक की, जो व्यक्ति खुद इस्लाम में परिवर्तित हो गया हो, वो शंकराचार्य के अद्वैत का मूल भी नही समझ सकता | दयानंद के ज्ञान के स्तर तक पहुँच पाना इनके बसकी नहीं है | विवेकानंद मांस खाने में राम कृष्ण के अस्तित्व को नकारने वाले देश के पहले सन्यासी हैं | जैन और बौद्ध दर्शन का अपने कितना अध्यन कर लिया हैं जो वेदानुकूल सिद्ध करते रहे | वेद भाष्य विद्यालय के आचार्यो या संस्कृतगयो के बस कि बात नहीं, इनका सही भाष्य करने के लिए समाधि लगानी भी आनी चाहिए, मन का एकाग्रचित्त होना अति आवश्यक है| महर्षि पाणिनि कि व्याकरण, अष्टाध्यायी पतंजलि का महाभाष्य, यस्कराचार्य का निरुक्त, निघंटु के साथ समाधि लगानी भी आनी चाहिए | दयानंद सारी विद्याओ और आत्मोनात्ति के ज्ञाता थे | रामकृष्ण और विवेकानंद तो योगदर्शन कि समाधी के पास भी नहीं पहुचे थे | श्री रामकृष्ण परमहंस जी की एक बार महर्षि दयानन्द से मुलाकात हुइ थी| यह एक छोटी सी मुलाकात मात्र थी, कोई शास्त्रार्थ नहीं था| महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्र लेखक श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी इस विषय की जानकारी लेने के लिए रामकृ्ष्ण मठ गए थे | वह बंगाल के ही रहने वाले थे और बंगाली उनकी मातृभाषा थी| लेकिन रामकृष्ण परमहंस जी में इतना अभिमान था कि उन्होंने एक बार भी वेद एवं दयानंद कृत सत्यार्थ प्रकाश का ज्ञान प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं दिखाई | यदि वे या उनके शिष्य दयानंद के सानिध्य का लाभ उठा पाते, तो निश्चित ही स्वयं को तथा राष्ट्र कों एक सही दिशा दे पाते | भारत का भविष्य इस्लाम में नहीं देखते| रामकृष्ण मठ में आज भी सन्यासी मांस खाते हैं, ये बात प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं|
किसी भी महान पुरुष पर गलत आक्षेप करने का मेरा कभी भी अभीप्राय नहीं हैं | आने वाले समय में हिन्दुओ पर होने वाले हमले के लिए उन्हें तैयार करना हमारा प्रथम ध्येय है | मैंने आर के मिसन की साईट पर भी तथ्यों को जाचा हैं | और इस वक्त वहाँ के आश्रम से भी संपर्क किया हैं | उपरोक्त तथ्य सही हैं भारत में प्रचलित साधुओ की तरह विवेकानंद भी थे, शास्त्रों की मर्यादा का पालन नहीं किया गया था| फिर भी अगर आर के मिशन वाले भी सेकुलरिस्म का प्रचार छोड कर ईसाईकरण और इस्लामीकरण के विरुद्ध साथ देते हैं तो मैं भी उनके सहयोग हेतु इस लेख को हटा दूँगा | बस उनके अनुयायियो को मांसाहार का समर्थन करने के बजाय सीधे से मांसाहार की निंदा करना होगा
http://jhindu.blogspot.in/2012/01/blog-post_30.html
राम कृष्ण मिशन अकाल व 1971 के युद्ध में उत्कृष्ट जनसेवा के लिए ये मिशन प्रशंसा का पात्र है| राम कृष्ण मिशन के इतने बड़े-२ आश्रम है, गौ सेवा हों सकती है | गौ रक्षा का ही कार्य करे, आश्रम में राष्ट्र भक्त और गौ भक्त बनेंगे| विवेकानंद दुर् दुर् तक राष्ट्र भक्त और गौ भक्त नहीं थे| वे तो आज के बाबाओं की तरह धन कमाने मे लगे थे| अंग्रेजों ने बहुत से मंच खड़े किये, साधओं के माध्यम से अपनी बात प्रचारित कराई विवेकानंद ने वही सब कहा | शुरू से ही विवेकानंद को धन देते रहे | किसने उन्हें शिकागो पहुचाया? सब अंग्रेजों का सुनियोजित षड्यंत्रों के अंतर्गत हुआ था | हिंदू शब्द कोई अति प्राचीन नहीं नवीन शब्द है इसकी तों कोई मूल धातु ही नहीं | अपभ्रंश को स्वीकारना बुद्धिसंगत नहीं | कृपया विवेकानंद के समर्थक उन्हें हिंदू धर्मं का उद्धारक सिद्ध करे | आप से एक प्रश्न:- क्या स्वामी विवेकानंद जी ने इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था ? विवेकानंद जी 1863 से लेकर 1902 तक इस पावन धरती पर रहे | क्या किया उन्होंने इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में यदि कोई भूमिका निभाई तो क्या, कब, कैसी, कहाँ ? कुछ उदाहरण दें | पते बतायें | कोई उल्लेख है क्या स्वामी विवेकानंद साहित्य में ? यदि नहीं तो क्यों नहीं ? और यदि कोई भूमिका नहीं निभाई तो फिर क्यों हम सब और हमारे शिक्षक विवेकानंद का चित्र 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ लगाते हैं ? क्यों ? कोई उत्तर? मैं ये सब प्रमाण के साथ लिख रहा हूँ | यदि आपको बुरा लगता है तो कृपा कर मेरी बात को गलत साबित करें प्रमाण दे कर | मांसाहारी और धुम्रपानी विवेकानंद को हम अपना आदर्श क्यों माने ??
प्रिय मित्रों, हम हिंदू बटे है क्यों कि हमें ढोंगी साधू सन्यासियों ने घेर रखा हैं| सन्यासी निर्भय होता है, विशुद्ध होता है, ना के माँसाहारी होता हैं और राष्ट्र को एक कर देता हैं आज अग्निवेश नाम का एक कथित सन्यासी खुद को आर्य समाजी कहता है जब के वास्तव में वह कमुनिस्ट नास्तिक विचारों वाला हैं | विवेकनन्द उस समय के अग्निवेश थे संघ किन कारणों से उठा रहा हमें नहीं पता पर उनका खुद का खानपान आचार व्यहवार हिन्दुओ जैसा नहीं था | हमने ये इसलिए लिखा ताकि कोई विवेकानंद का नाम लेकर हिंदू मांसाहार का भविष्य में समर्थन न कर सके जैसे ये कर रहे हैं, देखिये इन्हें http://creative.sulekha.com/i-am-a-hindu-and-a-beef-eater-too_112337_blog| अपने ही धर्म के संयासियो कि हम अकारण निंदा कर के पाप के भागी थोड़े बनाना चाहेंगे | जो जैसा है हम वैसा ही लिखेंगे | हिंदू शब्द मुसलमानों और अंग्रेजो से प्रचलन में आया | विवेकानंद संयासियो के राष्ट्रवाद को खत्म करने के लिए बर्तानिया मीडिया द्वारा उठाये गए थे | तभी हिंदू शब्द का प्रचार किया| 1934 तक राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ गाता रहा नमो वत्सले आर्य भूमे....सारे कवि आर्य शब्द का ही प्रयोग करते थे| खुद डॉ हेडगवार के परिवार की आजीविका का साधन आर्यसमाजी कर्म कांड था| ये 1935 के एक सम्मलेन में निर्णय हुआ था कि आर्य के स्थान पर हिंदू शब्द का प्रयोग करेंगे, तो विवेकानंद समर्थक हिंदुओं को संघ से जोड़ सकेंगे | संभवतः संघ का हिंदू धर्म को खोखला करने वाले पाखंडी एवं असाधुयों से यह पहला समझौता था | तब से संघ अपना स्तर विवेकानंद, राम कृष्ण मिशन से आगे बढता हुआ आज आसाराम, अखाडा साधुओं, नागा साधुओं, डेरा सच्चा सौदा, निर्मल बाबा, साईं जैसों के द्वार से बंधे श्यान पर ले आया है | संघ के प्रचारकों का ज्ञान स्तर विवेकानंद या नागा साधुओं से ज्यादा नहीं है यही कारण है की अल्पसंख्यकों की घर वापसी कराने में ये असफल रहे हैं | नतीजा है कि जहाँ-जहाँ संघ के आशीर्वाद से भाजपा सरकार बनाती है, हिंदू धर्मावलंबियों की संख्या प्रतिशत उसी प्रकार घटता जाता है जिस प्रकार काँग्रेस या साम्यवादीयों के शासन काल में घटता है| सभी प्रचारकों को हिंदू धर्म से परिचित होने के लिए स्वामी दयानंद कृत सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन अवश्य करना चाहिए|
गर्व से कहो हम आर्य हैं भाई
(जिन मित्रों को इस लेख में थोडा सा भी संदेह हो वो विवेकानंद की जीवनी पढ़े किसी के ऊपर ऊँगली उठाने से कुछ फायदा नहीं है अगर आपको ऊँगली उठानी है तो प्रमाण के साथ उत्तर दे कर ऊँगली उठाये ।)
(साभार राष्ट्रीय प्रहरी ब्लाग http://answeringyou.blogspot.in/2011/01/blog-post.html)
अब तक तो स्वयं आप देख चुके होंगे की विवेकानंद का मस्तिष्क या तो अस्थिर था या यह वह जान बुझ कर विरोधाभाषी बात करते थे| कारण साफ है मौके का फायदा उठाना और आप को कोई बुरा न कहेगा| सबकी प्रशंशा करो, सत्य को हांड़ी पे चड़ा दो | स्वयं 'Teachings of Vivekanand' के संपादक पुस्तक की भूमिका में लिखते है -
"Vivekanand was the last person to worry about formal consistency. He almost always spoke extempore, fired by the circumstances of the moment, addressing himself to the condition of a particular group of hearers, reacting to the intent of a certain question. That was his nature- he was supremly indifferent if his words of today seems to contradict those of yesterday".
ऐसे व्यक्ति को अवसरवादी कहते है | सत्यवादी ऐसा व्यक्ति कैसे हो सकता है क्यों की या तो कल की बात सही होगी या आज की | क्या एक संत को सत्य वादी न होना चाहिए ?
है जिसने न वेद का और ना मनुस्मृति का अध्ययन किया हो|
निर्णय आपके हाथ में है विवेकनन्द किस प्रकार हर बार अपनी बात से पलट जाता हैं | हिन्दुओ में ना जाने कितने ढ़ोंगी बाबा हैं| विवेकानंद कोई अपवाद नहीं है| जा कर लेख में दिए गए प्रमाणों को जाचो फिर यहाँ कमेन्ट करो |
क्या आप भी विवेकानंद कि तरह
भगवान राम, कृष्ण को काल्पनिक मानते हैं ?
आप भी माँसाहारी हैं ?
आपके गुरु भी पाँच वक़्त कि नमाज पढ़ने लगे थे क्या ?
क्या आप को युवा अवस्था में बहुत रोगों ने घेर रखा है ?
Vivekananda was an opportunist.
Please verify the following words on RK Mission site as well
http://truthclub.wordpress.com/category/false-gods/vivekananda/
http://www.ramakrishnavivekananda.info/reminiscences/057_ksi.htm
“The Swami also told that he had long taken no fish food, as the South Indian Brahmins whose guest he had been throughout his South Indian tour were forbidden both fish and flesh, and would fain avail himself of this opportunity to have his accustomed fare. I at once expressed my loathing for the taking of fish or flesh as food. The Swami said in reply that the ancient Brahmins of India were accustomed to take meal and even beef and were called upon to kill cows and other animals in yajnas or for giving madhuparka to guests. He also held that the introduction and spread of Buddhism led to the gradual discontinuance of flesh as food, though the Hindu shastras (scriptures) had always expressed a theoretical preference for those who avoided the use of flesh-foods, and that the disfavour into which flesh had fallen was one of the chief causes of the gradual decline of the national strength, and the final overthrow of the national independence of the united ancient Hindu races and states of India. He informed me, at the same time, that in recent years Bengalis had, as a community, begun to use freely animal food of several kinds and that they generally got a Brahmin to sprinkle a little water consecrated by the utterance of a few mantras over a whole flock of sheep and then, without any further qualms of religious conscience, proceeded to hand, draw, and quarter them. The Swami’s opinion, at least as expressed in conversation with me, was that the Hindus must freely take to the use of animal food if India was to at all cope with the rest of the world in the present race for power and predominance among the world’s communities, whether within the British empire, or beyond its limits. I, as a Brahmin of strong orthodox leanings, expressed my entire dissent from his views and held that the Vedic religion had alone taught to man his kinship and unity with nature, that man should not yield to the play of sensuous cravings or the narrow passion for political dominance. The ennobling gospel of universal mercy which had been the unique possession of the Hindus, especially of the Brahmins of South India, should never be abandoned as mistaken, out of date, or uncivilized, and that the world can and ought to make a great ethical advance by adopting a humane diet, and also that no petty considerations of national strength or revival should prevail against the adoption of a policy of justice and humanity cowards our dumb brother-jivas of the brute creation. Knowing, as I fully did, the Swami’s views on this question, I was not surprised to learn that, while in America he had been in the habit of taking animal food, and I think he treated with silent contempt the denunciations and calumnies directed against him on this account.”
सायन, महीधर, उव्वट के भाष्यों से वैदिक धर्मं बदनाम हुआ हैं| आज भी मुसलमान/इसाईं उन्ही का वेद भाष्य प्रयोग कर हिंदू धर्म के बारे में मिथ्या प्रचार करते है कि प्राचीन काल में हिंदू मासाहारी थे, गौमांस भक्षी थे, मूर्तिपूजक थे, जातिवादी थे | रोमिल्ला थापर तथा अन्य साम्यवादी इतिहासकार कोंग्रेस के साथ मिलकर इस मिथ्या प्रचार को छात्र –छात्राओं को पढ़ाने का प्रपंच राष्ट्रीय नीति बना कर करते हैं | ये लोग दयानंद के वैज्ञानिक भाष्य में त्रुटि निकालने का साहस नहीं कर पाते हैं | आर्य समाज ने टूटे हुए हिंदू समाज को एक किया, हर वर्ग से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बनाये | कितने क्रन्तिकारी दिए श्याम जी कृष्ण वर्मा, लाला लाजपत राय, रास बिहारी बोस, राम प्रसाद बिस्मिल, भाई परमानन्द, स्वामी श्रद्धानंद, श्यामा प्रसाद मुख़र्जी | हिंदू धर्मं का रक्षक हैं आर्य समाज | अब बात करे राम कृष्ण और विवेकानंदक की, जो व्यक्ति खुद इस्लाम में परिवर्तित हो गया हो, वो शंकराचार्य के अद्वैत का मूल भी नही समझ सकता | दयानंद के ज्ञान के स्तर तक पहुँच पाना इनके बसकी नहीं है | विवेकानंद मांस खाने में राम कृष्ण के अस्तित्व को नकारने वाले देश के पहले सन्यासी हैं | जैन और बौद्ध दर्शन का अपने कितना अध्यन कर लिया हैं जो वेदानुकूल सिद्ध करते रहे | वेद भाष्य विद्यालय के आचार्यो या संस्कृतगयो के बस कि बात नहीं, इनका सही भाष्य करने के लिए समाधि लगानी भी आनी चाहिए, मन का एकाग्रचित्त होना अति आवश्यक है| महर्षि पाणिनि कि व्याकरण, अष्टाध्यायी पतंजलि का महाभाष्य, यस्कराचार्य का निरुक्त, निघंटु के साथ समाधि लगानी भी आनी चाहिए | दयानंद सारी विद्याओ और आत्मोनात्ति के ज्ञाता थे | रामकृष्ण और विवेकानंद तो योगदर्शन कि समाधी के पास भी नहीं पहुचे थे | श्री रामकृष्ण परमहंस जी की एक बार महर्षि दयानन्द से मुलाकात हुइ थी| यह एक छोटी सी मुलाकात मात्र थी, कोई शास्त्रार्थ नहीं था| महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्र लेखक श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी इस विषय की जानकारी लेने के लिए रामकृ्ष्ण मठ गए थे | वह बंगाल के ही रहने वाले थे और बंगाली उनकी मातृभाषा थी| लेकिन रामकृष्ण परमहंस जी में इतना अभिमान था कि उन्होंने एक बार भी वेद एवं दयानंद कृत सत्यार्थ प्रकाश का ज्ञान प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं दिखाई | यदि वे या उनके शिष्य दयानंद के सानिध्य का लाभ उठा पाते, तो निश्चित ही स्वयं को तथा राष्ट्र कों एक सही दिशा दे पाते | भारत का भविष्य इस्लाम में नहीं देखते| रामकृष्ण मठ में आज भी सन्यासी मांस खाते हैं, ये बात प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं|
किसी भी महान पुरुष पर गलत आक्षेप करने का मेरा कभी भी अभीप्राय नहीं हैं | आने वाले समय में हिन्दुओ पर होने वाले हमले के लिए उन्हें तैयार करना हमारा प्रथम ध्येय है | मैंने आर के मिसन की साईट पर भी तथ्यों को जाचा हैं | और इस वक्त वहाँ के आश्रम से भी संपर्क किया हैं | उपरोक्त तथ्य सही हैं भारत में प्रचलित साधुओ की तरह विवेकानंद भी थे, शास्त्रों की मर्यादा का पालन नहीं किया गया था| फिर भी अगर आर के मिशन वाले भी सेकुलरिस्म का प्रचार छोड कर ईसाईकरण और इस्लामीकरण के विरुद्ध साथ देते हैं तो मैं भी उनके सहयोग हेतु इस लेख को हटा दूँगा | बस उनके अनुयायियो को मांसाहार का समर्थन करने के बजाय सीधे से मांसाहार की निंदा करना होगा
http://jhindu.blogspot.in/2012/01/blog-post_30.html
राम कृष्ण मिशन अकाल व 1971 के युद्ध में उत्कृष्ट जनसेवा के लिए ये मिशन प्रशंसा का पात्र है| राम कृष्ण मिशन के इतने बड़े-२ आश्रम है, गौ सेवा हों सकती है | गौ रक्षा का ही कार्य करे, आश्रम में राष्ट्र भक्त और गौ भक्त बनेंगे| विवेकानंद दुर् दुर् तक राष्ट्र भक्त और गौ भक्त नहीं थे| वे तो आज के बाबाओं की तरह धन कमाने मे लगे थे| अंग्रेजों ने बहुत से मंच खड़े किये, साधओं के माध्यम से अपनी बात प्रचारित कराई विवेकानंद ने वही सब कहा | शुरू से ही विवेकानंद को धन देते रहे | किसने उन्हें शिकागो पहुचाया? सब अंग्रेजों का सुनियोजित षड्यंत्रों के अंतर्गत हुआ था | हिंदू शब्द कोई अति प्राचीन नहीं नवीन शब्द है इसकी तों कोई मूल धातु ही नहीं | अपभ्रंश को स्वीकारना बुद्धिसंगत नहीं | कृपया विवेकानंद के समर्थक उन्हें हिंदू धर्मं का उद्धारक सिद्ध करे | आप से एक प्रश्न:- क्या स्वामी विवेकानंद जी ने इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था ? विवेकानंद जी 1863 से लेकर 1902 तक इस पावन धरती पर रहे | क्या किया उन्होंने इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में यदि कोई भूमिका निभाई तो क्या, कब, कैसी, कहाँ ? कुछ उदाहरण दें | पते बतायें | कोई उल्लेख है क्या स्वामी विवेकानंद साहित्य में ? यदि नहीं तो क्यों नहीं ? और यदि कोई भूमिका नहीं निभाई तो फिर क्यों हम सब और हमारे शिक्षक विवेकानंद का चित्र 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ लगाते हैं ? क्यों ? कोई उत्तर? मैं ये सब प्रमाण के साथ लिख रहा हूँ | यदि आपको बुरा लगता है तो कृपा कर मेरी बात को गलत साबित करें प्रमाण दे कर | मांसाहारी और धुम्रपानी विवेकानंद को हम अपना आदर्श क्यों माने ??
प्रिय मित्रों, हम हिंदू बटे है क्यों कि हमें ढोंगी साधू सन्यासियों ने घेर रखा हैं| सन्यासी निर्भय होता है, विशुद्ध होता है, ना के माँसाहारी होता हैं और राष्ट्र को एक कर देता हैं आज अग्निवेश नाम का एक कथित सन्यासी खुद को आर्य समाजी कहता है जब के वास्तव में वह कमुनिस्ट नास्तिक विचारों वाला हैं | विवेकनन्द उस समय के अग्निवेश थे संघ किन कारणों से उठा रहा हमें नहीं पता पर उनका खुद का खानपान आचार व्यहवार हिन्दुओ जैसा नहीं था | हमने ये इसलिए लिखा ताकि कोई विवेकानंद का नाम लेकर हिंदू मांसाहार का भविष्य में समर्थन न कर सके जैसे ये कर रहे हैं, देखिये इन्हें http://creative.sulekha.com/i-am-a-hindu-and-a-beef-eater-too_112337_blog| अपने ही धर्म के संयासियो कि हम अकारण निंदा कर के पाप के भागी थोड़े बनाना चाहेंगे | जो जैसा है हम वैसा ही लिखेंगे | हिंदू शब्द मुसलमानों और अंग्रेजो से प्रचलन में आया | विवेकानंद संयासियो के राष्ट्रवाद को खत्म करने के लिए बर्तानिया मीडिया द्वारा उठाये गए थे | तभी हिंदू शब्द का प्रचार किया| 1934 तक राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ गाता रहा नमो वत्सले आर्य भूमे....सारे कवि आर्य शब्द का ही प्रयोग करते थे| खुद डॉ हेडगवार के परिवार की आजीविका का साधन आर्यसमाजी कर्म कांड था| ये 1935 के एक सम्मलेन में निर्णय हुआ था कि आर्य के स्थान पर हिंदू शब्द का प्रयोग करेंगे, तो विवेकानंद समर्थक हिंदुओं को संघ से जोड़ सकेंगे | संभवतः संघ का हिंदू धर्म को खोखला करने वाले पाखंडी एवं असाधुयों से यह पहला समझौता था | तब से संघ अपना स्तर विवेकानंद, राम कृष्ण मिशन से आगे बढता हुआ आज आसाराम, अखाडा साधुओं, नागा साधुओं, डेरा सच्चा सौदा, निर्मल बाबा, साईं जैसों के द्वार से बंधे श्यान पर ले आया है | संघ के प्रचारकों का ज्ञान स्तर विवेकानंद या नागा साधुओं से ज्यादा नहीं है यही कारण है की अल्पसंख्यकों की घर वापसी कराने में ये असफल रहे हैं | नतीजा है कि जहाँ-जहाँ संघ के आशीर्वाद से भाजपा सरकार बनाती है, हिंदू धर्मावलंबियों की संख्या प्रतिशत उसी प्रकार घटता जाता है जिस प्रकार काँग्रेस या साम्यवादीयों के शासन काल में घटता है| सभी प्रचारकों को हिंदू धर्म से परिचित होने के लिए स्वामी दयानंद कृत सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन अवश्य करना चाहिए|
गर्व से कहो हम आर्य हैं भाई
(जिन मित्रों को इस लेख में थोडा सा भी संदेह हो वो विवेकानंद की जीवनी पढ़े किसी के ऊपर ऊँगली उठाने से कुछ फायदा नहीं है अगर आपको ऊँगली उठानी है तो प्रमाण के साथ उत्तर दे कर ऊँगली उठाये ।)
(साभार राष्ट्रीय प्रहरी ब्लाग http://answeringyou.blogspot.in/2011/01/blog-post.html)
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